हे देवी!

हे देवी।

हे जगतमाता, सर्वसंतापनिवारिणी
तुम शक्ति स्वरूपा भव्य हो
हे मातृ ममत्व सुपालिनी
मूर्त रूप सर्वस्व हो।

हे मातृदेवी, सर्व लोकनिवासिनी
वेदों की तुम वैभव्य हो
हे असुर संहारिणी
पराकाष्ठ कर्तव्य हो।

हे मातेश्वरी, हे विंध्यवासिनी
सुगम दृष्टा नव्य हो
हे वीणाधारिणी
अथक सुभाषित कव्य हो।

हे प्रकृति, वसुंधरा प्रवासिनी
कला समुद्र दर्शव्य हो
हे सर सरोज संरोमिणी
सुरभित स्नेह सुदर्श्य हो।

महिला रचना है ईश्वर की…

महिला रचना है ईश्वर की…

किलकारी एक कन्या की जब
वंश जाति का मान बने।
कन्या रहकर के कुटुंब धरा में
वह सुन्दरता का प्रमाण बने।

किशोरी कलात्मकता में बुनकर
सरलतम विज्ञ व्यवहार बने।
अर्जित कर ज्ञान प्रतिपल वह
सभी जग-बंधन का हार बने।

सम्बन्धित प्रियजन छाँव में
वह लाडली सबकी स्नेह बने।
स्वच्छंद चरण और मति की वह
ज्योति की सुरभित नेह बने।

महिला एक मूरत त्याग की
वह प्रेम सुधा आकार बने।
अलंकृत नित वीरांगनाओं में
अकेली शत समाहार बने।

महिला जब तक है ज्ञात शांत
वह शीतल नीर सी हीर लगे।
आलम्बन हो जब क्रोधित रूप
तो देवी काली का प्रतीक लगे।

मान लिया जिसने नारी को
शक्ति सहित सर्वस्व भाव,
उन देवों को वह अति प्रिय
पावन गंगा, वेद, कुरान लगे।

महिला रचना है ईश्वर की,
महिला रचना है ईश्वर की।