मोरल होली

फ़ाग आवै देखन झूम के
सब काम काज तब छाड़ रहत।
पिंटू उल्लासित होय के
बस व्हाट्सअप मा चिट-चैट करत।

ग्रुप नाना प्रकार मा जुड़े रह के
हर मेसेज ल फ़ॉरवर्ड करत।
कछु भी कंटेंट हा छूटय मत
सब मीडिया ल देखी के रहत।

होरी बधाई सब पिक्स मा है
मेमोरी फुल दुई डिस्क रहत।
अगले क्षण डिलेट करै जब
तब मोबाइल हा हाई स्पीड बनत।

एक ग्रुप मा होवै वाद विवाद
त पिंटू जा के कूद पड़त।
जब मैटर अति सेंसिटिव बनी
तब ये मेसेज अंधाधुंध जड़त।

रिपोर्ट होत ग्रुप मेम्बर के
पोलिस आइस त केस बनत।
मोबाईल जब्त होई के तब
पिंटू हा जेल मा बड़ फफकत।

होरी बीतन बड़ दिन भयौ
पछ्तात विचार करै पिंटू…

खेल लेतेव बिरंगी होरी ल
रंग-रोगन से, प्रिय-लोग रंगत।
अब नाहिं धरै मोबाइल ल
न मेसेज व्हाट्सअप माहि करत।

टेकिस्ट

अपनी विलासिताओं से भरा हुआ शहर- टेकारी, जहाँ लोग बेरोजगार से परेशां होकर पलायन भावना से आकर्षित हुए, और शहर की जनसँख्या कम करते गये।

उन्हीं में से एक बेरोजगार युवक जिसका नाम टेकेन्द्र है, उज्जड़ और आधा घड़ा है।
मतलब- अर्धज्ञानी और वाचाल भी है।
उसके पास कम्प्यूटर का सर्टिफिकेट था लेकिन कम्प्यूटर ज्ञान नहीं।
रुकिए, टेकेन्द्र का नाम यूँ ही उसके माँ-बाप ने नही रखा। उसका नाम तो अजित था। लेकिन उसे अपने नाम का अर्थ उसके दोस्तों ने बताया था कि “जो कभी जीत न सके” उसे अजित कहते हैं।
इसलिए उसने अपना नाम बदल कर ‘टेकेन्द्र’ रखा जिसका मतलब उसने सोचा था- ‘टेक्नोलॉजी का इंद्र’।

तो टेकेन्द्र भी अपने शहर की सीमाओं का उल्लंघन कर एक गाँव आता है, इस आशा से कि यहाँ उसे कुछ न कुछ काम मिल ही जायेगा।

अतः थक हार कर एक कम्प्यूटर सेंटर मिलता है, वह वहां जाता है और अपनी व्यथा सुनाता है।
दुकान का मालिक- घन्नू जो विवाहित है, उसकी कथा सुनकर उसे अपने दुकान में काम दे देता है।

कुछ दिन बाद…

घन्नू- यार टेकेन्द्र, मेरी पत्नी को अपने मायके जाना है। मुझे भी वहां रुकना पड़ेगा। 15 दिन लग जायेंगे। तुम यहाँ का कामकाज सम्हाल लेना।
टेकेन्द्र- ठीक है भैय्या। मैं यहाँ सब सम्हाल लूँगा।

घन्नू अपनी पत्नी के साथ अपने ससुराल चला जाता है।

अगले दिन एक विदेशी- ‘डेंस’ का गाँव में आगमन होता है। इस गाँव की सुन्दरता से मोहित होकर सोचता है कि मैं यहाँ जिन्दगी भर रुकने के लिए तैयार हूँ। लेकिन घर बार का इन्तेजाम कहाँ से करूं।
वह सोचता है कि यहाँ की नागरिकता ले लेता हूँ बाकी काम बन जायगा।
उसके सुन रखा था कि यहाँ का पहचान पत्र आधार कार्ड है। तो आधार बनवाने वह सेंटर जाता है जो घन्नू का है।

डेंस(अंग्रेजी में)- आई वन्ना मेक ए ‘बेस कार्ड'(मैं आधार कार्ड बनवाना चाहता हूँ)
टेकेन्द्र- क्या, मेरा यहाँ खुद का बेस नहीं बना है तू अपने बेस की बात करता है।
डेंस- नो, नो… आई मीन ‘अडार-कार्ड'(नही, नही.. मेरा मतलब आधार कार्ड)
टेकेन्द्र- क्या बोल रहा है.. अडार? भाई ओरू-अडार-लव की बात कर रहा है क्या! हां भाई बलवा हो रहा है उसके नाम पर क्या करें, प्रिया-प्रकाश जैसी कहानी हमारे नसीब में नहीं।
डेंस- उफ्फ! यू आर नॉट अंडरस्टैंडिंग…
डेंस कम्प्यूटर के नेट में सर्च करके दिखाता है कि उसे यही आधार कार्ड बनवाना है।
टिकेंद्र- तो अईसा बोलो न। अपना कोई पहचान पत्री लाओ… बन जायगा।
डेंस समझ जाता है। और अपना फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस दे देता है, 2 दिन में आधार कार्ड उसे मिल जाता है।

कुछ दिन बाद डेंस किसी तरह एक घर ले लेता है। लेकिन पोलिस को पता चल जाता है कि डेंस यह का नागरिक नहीं है। तो पोलिस छानबीन करके डेंस के घर पहुँचती है और उचित जवाब न मिलने फर्जी आधार कार्ड और पहचान पत्र रखने पर गिरफ्तार कर लेती है।
पूछताछ पर वह बताता है कि कम्प्यूटर सेंटर से उसने कार्ड बनवाया है।
पोलिस घन्नू के कम्प्यूटर सेण्टर को सील कर देती है और टेकेन्द्र को भी गिरफ्तार कर लेती है।
टेकेन्द्र डेंस से- क्यों बे साले डेंस, मुझे फंसवा दिया। तुझे तो ढेंस-कांदा बना के छोडूंगा।

कुछ समय बाद डेंस, पोलिस को रिश्वत देकर छूट जाता है।

कुछ दिन बाद घन्नू वापस गाँव आता है। यहाँ अपने दुकान को सील हुआ देखकर घबरा के पोलिस स्टेशन पहुँचता है। सारा मामला समझ में आता है उसे।
टेकेन्द्र- भाई, मुझे बचा लो।
घन्नू टेकेन्द्र से- साले गधे तू तो यहीं सड़।

मान मिन्नतों के बाद भी घन्नू अपने दुकान को नहीं छुड़वा पाता।
वह तो बर्बाद ही हो जाता है और पछताता है।
टेकेन्द्र खुद तो डूबा, दूसरों को भी चपेट में ले चुका था।
तो यही है- टेक-अज्ञान

सार- आधा ज्ञान खतरनाक है।