अन्त्याक्षर

शुरू हुयी अन्त्याक्षरी, लेकर खुद का नाम

सोम रस बदनाम है
सो रसिक होए बदनाम,
पिवत न चढ़त कुछ देह मा,
वो ‘वंस मोर’ गुण गाय।

पिवत ही चढ़त जिन नर के
वो दरुहा कहलाये,
बेवड़ बन के, खुद भी
नरपति ही बन जाय।

नरपति बन के करत नृत्य
मारग मा लोटियाय
लोगन देख करै हाय हाय
तब पुलिस धरत ले जाय

सत्य कहत कविराय,
जो नर गावत रस सोम के
वो बचय रहे न कुछ काम के,
हर काम खतम हो जाए
सब वंस तोर हर जाए।

जो समझै अंत अक्षर जीवन के
मानो वो भव पार हो जाय।

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कालाखर

शहर से दूर एक गाँव भैंसझार, जहाँ सिर्फ भैंसों की जनसँख्या.
दृश्य तो आप समझ ही रहे होंगे.. रास्ता भैंसों की विष्ठा से पटा हुआ, कीचड़ भरे तालाब में दुबकी मारे हुए भैंस.
जुगाली करते हुए आनंदित मुद्रा में टहलते हुए.
लेकिन एक भैंस- पिकलू, जो खुद को शहर में और अपना दिमाग दौड़ाते दो शब्द सीख गया था,
लेकिन सीखा क्या? यही- ”काला आखर भैंस बराबर”
वह शहर में इस वाक्य को सुनकर आया, और गाँव वालों को बता दिया.
पिकलू(गांव वालों से)- सुनो सुनो भाइयों बहनों, यहाँ तो हम मौज से हैं. लेकिन बाहर क्या हो रहा है पता भी है?
मुखिया- क्या हो रहा है?
पिकलू- हमारे कुल का मज़ाक बनाया जा रहा है. लोग मिसालें देते हैं अनपढों को- ”काला आखर भैंस बराबर”
मुखिया- अरे, ये तो शर्म की बात है जी.
पिकलू- तो क्या, बहुत ज्यादा.
मुखिया- बात काले कलर की रहती तो चल जाता, रंगभेद सह लेते. लेकिन हमारे चरित्र, स्तर को निशाना बनाकर
हमारा अपमान किया जा रहा है. कुछ तो करना पड़ेगा.
गाँव वाले- पर करें क्या?
मुखिया- हाँ, यही तो मसला है. पंचायती बुलाओ, तभी निर्णय होगा.
पंचायत बैठती है…
मुखिया- हाँ, तो बारी बारी से बताओ, क्या किया जाना चाहिए?
पहला गांववाला- हमें तो झुण्ड बनाकर शहर पे हमला कर देना चाहिए. मुखिया- नहीं, इससे हमारा जुमला खत्म नहीं होगा.
दूसरा- तो फिर, हमें भी आदमियों के नाम पर भी जुमला बनाकर शहर में पोस्टर चिपका देना चाहिए.
मुखिया- नहीं, ये भी काम का नहीं.
तीसरा- हमें शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए.
मुखिया- ये कुछ ठीक है, लेकिन हमें पढाएगा कौन.?
चौथा- हम किसी ऐसे आदमी को ढूंढ लेंगे जो भैंसों को पढ़ाए.
मुखिया- नहीं, आदमी सिर्फ आदमी को पढ़ाता है. हम जायेंगे तो हमे खेतों का रास्ता दिखा देंगे वो लोग.
पिकलू- मुखिया, मैंने वहाँ एक चीज़ देखी, सिस्टम बदलने के लिए कुछ लोग पंचायती बैठते हैं.
वहाँ कुछ लोग ताश खेलते हैं, कुछ सोते रहते हैं, कुछ मोबाईल चलाते रहते हैं.
ऐसा करके कुछ लोग पोलिस से हाथापाई करके उनके डग्गे में बैठकर चले जाते हैं.
दूसरे दिन उनकी पंचायती खत्म हो जाती है. फिर उनका आर्डर मान लिया जाता है.
मुखिया- हाँ पिकलू, ये सलाह अच्छी लग रही है. हमें भी ऐसा कुछ करना चाहिए.
लेकिन हममें से कोई शहर कभी गया नही. हम कल ही जायेंगे. शहर के मुखिया तुम बनोगे.
दूसरे दिन पूरा गाँव शहर की तरफ कूच करता है…
अगवाड़ा पिकलू करता है. बांकी सभी उसके पीछे.
लेकिन सभी का उत्साह अलग ही रहता है. किसी को वहां का नियम नहीं पता.

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तो शहर में घुसते ही कोई भैंस किसी और रस्ते चलता है, तो कोई और किसी रस्ते.
कोई वहां के बिल्डिंग में घुस रहा है, वहाँ उसने विष्ठा कर दी. बिल्डिंग का गार्ड भैंस को खदेड़ने लगा.
भैंस तो चला गया लेकिन अभी भी आनंदित है, वह दूसरे भैंस से कहता है- यहाँ बीट करने का आनंद ही अलग है.
एक भैंस होटल में घुस गया, कुछ टेबल के प्लेटों में पकवान का मज़ा ले रहा है..
एक भैंसी शीशे के दुकान में घुस गयी, शीशे में अपनी छाया देखकर दूसरी भैंस समझने लगी.
ये आगे बढ़ी, वो भी आगे, इसने सींग दिखाया उसने भी. बस फिर क्या था,
हो गयी भिडंत. शीशे का दुकान चकनाचूर.
पिकलू किस किस को रोकने जाए, आखिर मुखिया तो यही है अब.
और दूसरी भैंसी को छू भी तो नहीं सकता.
पिकलू परेशान होकर किसी को सम्हाल नहीं पाता. हार कर अपनी जान बचाने वो अपने गाँव ही भाग जाता है.
कुछ घंटो में सारे भैंस उस पुरे मोहल्ले, मार्केट का सत्यानाश कर डालते हैं.
शहर वाले पोलिस को फोन करते हैं.
पोलिस आती है, लेकिन वो भी किस किस को पकड़े. अंत में एक भैंस को पकड़ने एक पोलिस लग जाती है.
सभी को पकड़कर जेल में डाल दिया जाता है.
कुछ दिन बाद सभी को शहर से दूर उन्ही के गाँव में खदेड़ देते हैं.
फिर से पंचायती बैठती है.
मुखिया- हमारी मांगे पूरी नहीं हुयी. हमें हड़ताल वापस लेना चाहिए.
शहर वालों को जो कहना है कहते रहे. हमें कोई फर्क नहीं पड़ता.
समाप्त.
आप सभी को पता चल चुका होगा… निरक्षर/अज्ञानता अभिशाप है.