अढ़ाई चाँवल

एक गाँव है, बिटकुली। चाहें तो आप इसे बिटकॉइन भी कह सकते हैं,
ये बात बिलकुल अलग है कि बिटकॉइन का बिटकुली से दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं।
फिर भी बताये दिए रहता हूँ, कल को ये इल्जाम मैं नही सह पाउँगा कि मेरा उच्चारण गलत है,
खैर… मेरे सेन्स पे जाइये, उच्चारण तो एक अलग मसला है।
अब बिटकुली में आते हैं..
यहाँ एक आदमी जो प्रवासी व्यापारी है, नाम है हरजा,
रुकिए, मैंने हरजा कहा. हरजाई नहीं. हालाँकि कुछ हरजाई पति होते हैं, मर्द नही।
जो भी हो, हरजा एक कूटनीतिज्ञ, चालाक और हैंडसम व्यक्ति है।
हैंडसम का यहाँ अर्थ ‘साफ हाथ’ है, या यूँ कह सकते हैं कि हाथ की सफाई जानता है ‘हरजा’।
तो हरजा व्यापार करके अपनी रोजी रोटी कमाता है, अविवाहित भी है।वह अपनी चलाकी से एक ठग बन जाता है,
क्यूंकि यही तो आजकल का नो-रिक्स(रिस्क) वाला बिज़नेस बन चुका है।
जो भी हो.. ठगने के लिए वह कभी क्लाइंट बन जाता तो कभी बॉस।
गाँव बड़ा था, क्यूंकि बिटकॉइन का भाव भी तो बड़ा है, इसलिए किसी को पता नही चला।
अब हरजा एक घर का बेल बजाता है, दरवाजा खुलते ही वह डाईलोग चालू करता है.. नमस्कार भाई साहब!
सामने जो आदमी है… वह है- हरुवा. नाम से हरा भरा है तो काम भी सिर्फ हरी पत्तियों वाला ही करता है.
मेरा मतलब है की खेती किसानी। वह भी 1 साल का प्रवासी है.
हरजा अपना परिचय देता है..
हरजा- भाई साहब, मै कमल, एक फील्ड क्लर्क-कम-सरकारी आदमी हूँ. मैं यहाँ आपके परिवार को अमीर बनाने आया हूँ।
हरुवा- हम तो अमीरों के खानदान से हैं सर।
हरजा- फिर भी आप तो जानते है भाईसाहब इन्सान की जरूरतें कम नही होतीं,
पैसे कम पड़ जाते हैं. इसलिए आपके लिए स्कीम लेकर आया हूँ.
पसंद न आये तो बिलकुल मना कर दीजियेगा। मै बताता हूँ आपको कि मेरे पास आपके लिए खजाना है।
हरुवा- बताइए!
हरजा- भाईसाहब, स्कीम के तहत कुछ पैसो को फ्रीफंड में जमा करके शून्य ब्याज़ पर
कुछ महीने में आपके रकम 5 गुना कर के आपको मिलेगा, उसका कुछ प्रतिशत मुझे अंशदान के रूप में मुझे देना होगा।
इसमें फर्ज़ी कुछ नहीं है, सबूत देख लीजिये, या स्टाम्प पेपर। चाहे तो अधिकारी से बात कर लीजिये।
हरुवा- वो तो ठीक है सर, पर आपका ऑफिस तो यहाँ गाँव में नहीं है, कहाँ से हैं आप।
हरजा- बस पास के डबरा गाँव के बाहर ही है।
हरुवा- ठीक, आपका प्रूफ दिखाइए..
हरजा प्रूफ दिखाता है।
हरुवा- कागजात तो ठीक है, पर मेरे पास नगदी कम है अभी,
कुछ महीनों में आ जायेंगे तब ले लूँगा स्कीम।

thag-pandit-1489515152_355x233.jpg
हरजा- पैसे की क्या बात है भाई साहब, आज दो या कल, स्कीम अभी ले लो।
हरुवा- आप यकीन दिल रहे है तो ले लेता हूँ।
हरुवा पैसे देकर स्कीम ले लेता है।
हरजा वहां से विदा लेता है, और कुछ दूर जाकर ख़ुशी से झूम जाता है।
वह अपने ऑफिस जाता है, और अपने साथ काम करने वाले मित्र- ढींगा को रकम देता है.
ढिंगा अपने पास अलग अलग आदमियों से लिए ठगी के रकम रखता है।
कुछ दिन बाद उसके ऑफिस में छापा पड़ता है लेकिन सिर्फ एक पोलिस वाला आता है.
पोलिस- फर्जी आदमी, लोगो को लूटता है. चल पोलिस स्टेशन।
ढींगा- माफ़ कीजिये सर, आगे से ऐसा नहीं होगा।
पोलिस- चल ठीक है, दया करके छोड़ रहा हूँ. लेकिन रकम जब्त होगा।
वह पोलिस ढींगा से रकम जब्त करके ले जाता है। ढींगा के पास एक धेला भी नहीं बचता।
अगले दिन यह बात हरजा को पता चलती है।
हरजा- क्यों बे ढींगा, सिर्फ एक पोलिस वाला तुझे लूट ले गया!
ढींगा- क्या करता भाई.. डर गया था मैं।
हरजा सोचता है- साला हमसे भी ज्यादा ठग हैं इस गाँव में। पता करना पड़ेगा।
किसी सोर्स से पता चलता है उसे कि वह पोलिस वाला तो हरुवा था।
वह हरुवा के घर जाता है..
हरजा- मान गये भाई साहब, आप खुद क्लर्क-कम-सरकारी आदमी निकले।
दोनों हंसते हैं.
कुछ दिन बाद तीनों- हरजा, हरुवा और ढींगा पुरे गाँव को ठग लेते हैं और फरार हो जाते हैं।
ठगी के रकम से अपना अढ़ाई चाँवल पकाते हैं।

उल्टा उस्तरा

उस्तरा भी कमाल है आजकल, मुड़वाने वालो का ख्याल बिलकुल नही रखता और मुड़ने वाला मुड जाता है अपना काम करके.
मान लीजिये मै सर मुड़ाने गया हूँ. अरे, मानना क्या है, सच्चाई ही है.
तो मै गया हूँ सर मुड़ाने. सेलून वाला बोलता है, आइये बैठिये, और पूछता है क्या करना है?
मै बोला- भाई मुझे हजार करोड़ का लोन नही चाहिए. बस सर मुड़ दे।
उसने कहा- मुड़ो.
मैं बोला – भाई मैं कैसे मुडू खुद को.
वो बोल- साहब, आप सीट पर बैठो मै सर मुडूगा.
थोड़ी देर बाद…
उसने कहा- क्या करते हो साहब?
मैं- कुछ खास नही भाई, रिपोर्टर हूँ.
वो बोला- तो क्या चल रहा है देश में?
मै- तुम्हे नही पता भाई, पेपर नही पढ़ते क्या?
वो- नही भैय्या, आजकल बंद कर दिया है.
मैं- क्यूँ?
वो- खबर पढ़ते ही बेईमानी करने को जी चाहता है.
मै- (मै समझ गया) सही कहते हो.
वो- पेमेंट कितना है भैय्या?
मै- ज्यादा नही है भाई, 12000 रुपये है. आधा पैसा बीवी पर खर्च हो जाता है। बचा हुआ का आधा बच्चों पर बांकी बचता है उससे राशन पानी.
वो- अरे बाप रे, बड़ी परेशानी है भैय्या आपकी, और वो लोग जो करोड़ो लेकर विदेश भाग जाते है उनकी आसानी.
मै- सही कह रहे हो. जो भाग जाते है वो ही सुखी. अच्छा करते हो जो पेपर नही पढ़ते, मै भी नौकरी छोड़ने वाला हूँ. लोन लेने का सोच रहा हूँ.
वो- क्यों साहब, लोन कैसे चुकोगे?
मै – अरे भाई, चुकाना किसको है. आजकल चुकाता कौन है?
वो- (थोडा दिमाग लगाकर) बहुत अच्छा आइडिया है भैय्या. दरअसल मेरी हालत भी आपके जैसे ही है. घर बार नही चलता सेलून से.
मै- हा वो तो है.

depositphotos_17682747-stock-illustration-western-saloon-cartoon
वो- मेरा कोई साथी भी नही है जो इस हालत में मदद करे.
मै- क्यों नही है?
वो- 2 साल हुए है भैय्या, लोन मिल जाता है आसानी से दोस्त सच्चा नही मिलता.
मै- कोई बात नही भैय्या.
वो- क्या भैय्या. आप तो लोन लेके मज़ा मार लोगे, हम फ़िर कभी पेपर उठाएंगे तो आपका नाम छपा होगा.
मैं- तुम्हारे पास दिमाग तो है भाई, मेरे साथ हो जाओ दोनों का नाम छपेगा.
वो- ठीक है भैय्या. बहुत बहुत धन्यवाद.
दोनों कुछ दिन बाद बैंक जाते हैं.
मैनेजर- क्या चाहिए?
दोनों- सर फोकट का पैसा चाहिए. हमारा मतलब, लोन चाहिए.
मैनेजर- फर्जी कागजात लाये हो. मतलब सिक्यूरिटी लाये हो?
दोनों- यही तो चलता है सर आजकल, मेरा मतलब सब असली हैं सर.
मैनेजर- कब तक का चाहिए?toon-1809

दोनों- सर लाइफ टाइम का.
मैनेजर- क्या?
दोनों- नही सर 5 साल तक का.
मैनेजर लोन अप्रूव कर देता है.
दोनों फर्जी कागजात वेरीफाई कराकर लोन लेकर चम्पत हो जाते है।
2 साल बाद न्यूज़ पेपर में दोनों की फोटो छपती है, आप समझ गए होंगे क्यों!
और मैनेजर पर उल्टा उस्तरा चलकर
अंततः सेलून का शटर गिरता है.